वेद मन्दिर, योल में चल रहे 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के 33वें दिन स्वामी राम स्वरूप जी, योगाचार्य ने ऋग्वेद मन्त्र 10/20/1 से समझाया,
धार्मिक समाचार "भद्रम् नो अपि वातय मनः" अर्थात् हे प्रभु! हमारे मन को कल्याण मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित कर। यह ईश्वर से प्रार्थना है परन्तु चारों वेदों में भगवान् ने यह उपदेश किया है कि केवल प्रार्थना से भगवान् प्रसन्न नहीं होता, प्रार्थना के अनुकूल शुभ कर्म भी करना होता है। अतः मन को वेद मार्ग पर चलाने का अभ्यास ही मन को जीवात्मा के वश में करता है। जैसे अथर्ववेद मन्त्र 6/41/1 में उपदेश है कि "मनसे" अर्थात् मन के द्वारा वेद मन्त्रों का मनन- चिंतन करना और "चेतसे" अर्थात् ज्ञान प्राप्ति के लिए, शुद्ध चित्त के लिए, "धिय" शुद्ध बुद्धि की प्राप्ति के लिए जिससे ध्यान लगे "वयम् हविषा विधेम" अर्थात् हम परमात्मा के लिए अग्निहोत्र/यज्ञ करते हैं। और वेदों में उपदेश किए हुए शुभ कर्म ही करते हैं, वेद विरुद्ध अशुभ कर्म नहीं करते। आगे मन्त्रों में ज्ञान है कि हम क्रोध को पैर से ठुकरा दें, कड़वे वचन न बोलें। ऐसे शुभ कर्म करने से बुराई से मन हट जाता है। अगले सूक्त 45 में उपदेश है कि हम प्रयासपूर्वक भी मन में पाप विचार आने पर उसका त्याग कर...