वेद मन्दिर, योल (हि.प्र.) में चल रहे 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के 44वें दिन स्वामी राम स्वरूप जी
, योगाचार्य ने जिज्ञासुओं को उपदेश दिया कि पिछले ऋग्वेद से तथा यजुर्वेद के प्रारम्भ से ईश्वर ने यज्ञ के हज़ारों गुण कहे हैं। अतः प्रथम हम यज्ञ पर ही विशेष ध्यान दें। उन्होंने यजुर्वेद मन्त्र 1/30 के विषय में जिज्ञासुओं को ज्ञान दिया कि परमेश्वर सर्वव्यापक हैं और पृथिवी के प्रत्येक पदार्थों को रसयुक्त करने वाले तथा अनन्त ज्ञान के भण्डार हैं। आज संसार की मनुष्य लिखित पुस्तकों में जो-जो सत्य ज्ञान है वह ईश्वर प्रदत्त वेदों से लिया गया है और जो-जो झूठ ज्ञान है, वह मनुष्यों ने स्वयं के विचारों से व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि ज्ञान दिए बिना ज्ञान नहीं होता। अतः आदि सृष्टि की रचना करते समय ईश्वर ने चार ऋषियों के हृदय में प्रथम ज्ञान दिया था। और योग शास्त्र सूत्र 1/26 के अनुसार परमेश्वर उन चार ऋषियों के प्रथम गुरु हुए। पुनः ब्रह्मा नामक ऋषि ने उन चार ऋषियों को अपना गुरु बनाया और स्वयं ब्रह्मा ने गुरु-शिष्य परम्परा प्रारम्भ की। हमें गहन विचार करना होगा कि गुरु गद्दी तो आदि सृष्टि के प्रारम्भ में बन जाती है जिसके प्रथम गुर...