वेद मन्दिर, योल (हि.प्र.) में चल रहे 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के 40वें दिन स्वामी राम स्वरूप जी
वेद मन्दिर, योल (हि.प्र.) में चल रहे 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के 40वें दिन स्वामी राम स्वरूप जी, योगाचार्य ने ऋग्वेद के अन्तिम मन्त्र 10/191/4 की जिज्ञासुओं द्वारा प्रदीप्त अग्नि में आहुतियाँ डलवाकर ऋग्वेद को पूर्ण किया एवं वायु ऋषि के हृदय में प्रकट हुआ यजुर्वेद प्रारम्भ किया। उन्होंने पूर्ण किए ऋग्वेद से समझाया कि सृष्टि के आदि में परमेश्वर से उत्पन्न केवल वेद वाणी ही समस्त ज्ञान एवं विज्ञान का अनन्त खजाना है। क्योंकि मनुष्य अल्प ज्ञान वाला और परमेश्वर अनन्त ज्ञान वाला है। ब्रह्मा से गुरु-शिष्य परम्परा प्रारम्भ हुई और वेद का ज्ञान पृथिवी पर विस्तारित (फैला) हुआ। केवल परमात्मा ही ऋषि-मुनियों के द्वारा सुखों की वर्षा कराने वाला सब जगत् का एक स्वामी है, जो वेदमार्ग पर चलकर उसे प्रसन्न करके प्राप्त होता है।
पुन: स्वामीजी ने ऋग्वेद के अन्तिम मंत्रों के कुछ अर्थ समझाए :-
1.परमेश्वर ने मनुष्यों को उपदेश किया कि हे मनुष्यों! अलग-अलग दल में ना बंधों किन्तु सब एक सूत्र में बंधे, मिलकर रहें, जिससे आप सब आपस में संवाद करें, विवाद ना करें। तुम्हारे मन एक हो जाएँ। जिस प्रकार पहले के युगों में एक मन हुए पिछले युगों के विद्वान् वेदानुसार अपने लाभ को प्राप्त करते थे, उसका सेवन करते थे, ऐसे तुम भी करते रहो।
2. मनुष्यों के विचार परस्पर एक समान हों, कर्म करने की प्रवृत्ति एक समान हो, मन और चित्त में उत्पन्न होने वाले विचार भी वेदानुसार शुभ हों। परमेश्वर की स्तुति, प्रार्थना एवं उपासना धरती पर रहने वाले सब मनुष्यों की एक समान हो।
3. हे मनुष्यों! तुम्हारी अहम् भावना एक समान हो (अर्थात् हम सब जीवात्माएँ हैं, हम सब एक हैं, कोई ऊँच-नीच नहीं है)। आपस में एक जैसा प्रेम का व्यवहार हो। तुम्हारे हृदय एक समान हों [अर्थात् सबके हृदय में वैदिक ज्ञान से प्रेरित एक समान शुद्ध विचार उठें, गंदे, पाप युक्त विचार किसी के भी ना हों]।मनुष्यों का व्यवहार अच्छा एवं सहयोग युक्त हो।
स्वामी जी ने उपदेश किया कि हमें ईश्वर से उत्पन्न इन विचारों का श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन ही विश्व में शान्ति स्थापित कर सकता है। निदिध्यासन का अर्थ है ‐- सुना, मनन-चिन्तन किया और फिर उसे जीवन में धारण कर लिया-- अपना लिया।
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