भारतीय संस्कृति केवल संस्कृत भाषा में ही विद्यमान है


वेद मंदिर, योल, हिमाचल प्रदेश में चल रहे 78 दिवसीय, चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के अवसर पर स्वामी राम स्वरूप जी, योगाचार्य ने जिज्ञासुओं को वेदों से उपदेश किया कि वर्तमान सृष्टि की उत्पत्ति 1 अरब, 96 करोड़ , 8 लाख , 53 हज़ार , 127 वर्ष पहले हुई है। सृष्टि उत्पत्ति से पहले प्रलय काल चल रहा था। अत: उस समय संसार में कोइ भी प्राणी अथवा कोई भी पदार्थ नहीं था। उस समय कोई आचार्य अथवा गुरु भी नहीं थे जो सृष्टि उत्पत्ति के बाद मनुष्य को ज्ञान दे सकें। ऋग्वेद मंत्र 1/22/3 में स्पष्ट उपदेश है कि ज्ञान दिए बिना ज्ञान नहीं होता। अतः ईश्वर ने जब प्रकृति को लेकर इस ब्रह्माण्ड की रचना की तब सृष्टि में उत्पन्न प्राणियों को ज्ञान देने वाला कोई भी गुरु नहीं था। इस विषय में उपदेश करते हुए ऋषि पताञ्जलि ने योग शास्त्र सूत्र 1/26 में उपदेश दिया है कि वह ईश्वर हमारे पूर्व अर्थात् पिछली सृष्टियों के गुरुओं का भी गुरु है क्योंकि पिछली सष्टियों के गुरु तो शरीर छोड़ चुके होते हैं परंतु परमेश्वर मृत्यु के बंधन से रहित है। अत: प्रत्येक सृष्टि का प्रथम गुरु परमेश्वर ही होता है और ऋग्वेद मन्त्र 10/181/1,2 के अनुसार परमेश्वर चार ऋषियों के हृदय में अपनी सामर्थ्य से वेद ज्ञान दिव्य संस्कृत भाषा में उत्पन्न करता है। अत: शुद्धा परिष्कृता च "संस्कृत भाषा" कथ्यते अर्थात् शुद्ध और सँवारी हुई तथा अशुद्धियों को शुद्ध की हुई भाषा को दिव्य संस्कृत भाषा कहते हैं। इस भाषा को देव वाणी भी कहते हैं। यह भाषा भारतवर्ष की एक अनुपम निधि है क्योंकि यह भाषा ईश्वर से उत्पन्न होने के कारण इस लोक की भाषा नहीं है अपितु दिव्य वाणी है। यह भाषा हम मनुष्यों से उत्पन्न मनगढ़ंत भाषा नहीं है। संस्कृत भाषा भारतीय संस्कृति की आधारशिला है। सभी प्राचीन ज्ञान भण्डार इस भाषा में ही सुरक्षित हैं। उपनिषद्, छ: दर्शन, वाल्मीकि रामायण, महाभारत ग्रन्थ, भगवद्गीता आदि ग्रन्थ लौकिक संस्कृत भाषा में ही लिखे गए हैं। अत: यदि हमारे देश में युवा पीढ़ी को संस्कृत भाषा का ज्ञान नहीं होगा तो हमारी संस्कृति, जो उपरलिखित ग्रन्थों में है, वह लुप्त हो जाएगी और हमारा नामो-निशाँ मिट जाएगा कि हम भारतीय हैं।
अत: हमारा सरकार से निवेदन है कि हमारी सभी पाठशालाओं, कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों में संस्कृत भाषा का ज्ञान देने की व्यवस्था बनाई जाए।

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