वेद मन्दिर, योल (हि.प्र.) में चल रहे 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के 38वें दिन स्वामी राम स्वरूप जी

तिथि --19/05/2026    

 योगाचार्य ने ऋग्वेद मन्त्र 10/117/1 का ध्यान आकर्षित करते हुए श्रद्धालुओं को ईश्वर का उपदेश समझाया कि (देवाः क्षुधम् वधम् न उ दधुः) केवल अन्न के अभाव में भूख से मृत्यु होती है, ऐसा विद्वान् नहीं मानते, (आशितम् उत मृत्यवः उपगच्छन्ति) भोजन प्राप्त भरे पेट वालों को भी मृत्यु प्राप्त होती है,अतः परमेश्वर अन्न दान के रहस्य को समझाते हुए इस मन्त्र में उपदेश करते हैं कि यदि कोई किसी भूखे को भोजन से तृप्त करते हैं तो उसका (रयिः न उपदस्यति) अर्थात् अन्न और धन कभी क्षीण नहीं होता परन्तु जो अन्य को भोजन से तृप्त नहीं करता हुआ स्वयं अकेला खाता है तो उसको सुखदायक परमात्मा की प्राप्ति कभी नहीं होती। 
    अन्न के इच्छुक के लिए विचरण करते हुए अचानक कहीं से कोई भूखा व्यक्ति आ जाए अथवा अन्न के अभाव में जिसका शरीर सूख-सा गया हो, उन्हें भोजन कराना पुण्य है, ईश्वर का उपदेश है। 
     मन्त्र 6 में उपदेश किया है कि जो विवेकहीन मनुष्य अन्न, धन, सम्पत्ति प्राप्त करके केवल अकेले खाकर पापी बनते हैं, इस पर परमेश्वर कहता है कि मैं (परमेश्वर) सत्य कहता हूँ कि यह धन--सम्पदा साक्षात् उसकी मृत्यु है क्योंकि वह उस धन से किसी वेद ज्ञाता विद्वान् को न पालता है और न ही अपने वंश के जन का पालन-पोषण करता है। वह तो केवल अकेला खाकर, केवल पापी बनकर रह जाता है। अतः ईश्वर ने वेद में दान की महिमा को समझाया है। वेद कहते हैं कि दान केवल अधिकारी को दिया जाता है, अनाधिकारी को नहीं।
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