वेद मन्दिर, योल (हि.प्र.) में चल रहे 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के 39वें दिन स्वामी राम स्वरूप जी, योगाचार्य ने ऋग्वेद मन्त्र 10/68/3 से जिज्ञासुओं को ज्ञान दिया


    

 वेद मन्दिर, योल (हि.प्र.) में चल रहे 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के 39वें दिन स्वामी राम स्वरूप जी, योगाचार्य ने ऋग्वेद मन्त्र 10/68/3 से जिज्ञासुओं को ज्ञान दिया कि आदि काल में ईश्वर द्वारा सृष्टि रचना के प्रारम्भ में परमात्मा ऋषियों के हृदय में जनहित एवं जनता का कल्याण करने वाली तथा दोषों को दूर करने वाली, वेद वाणियों का प्रकाश करता है। वेद वाणियाँ ध्यान द्वारा जिज्ञासुओं को प्राप्त होती हैं। वेद वाणी को ऋषिजन ठीक प्रकार से धारण करके अनादि काल से बहुत देशों में प्रचारित करते हैं। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि इस परम्परा में ईश्वर द्वारा चार ऋषियों को वेदवाणी का ज्ञान हुआ। पुन: चार ऋषियों से ब्रह्मा नामक मनुष्य को वेद-वाणी का ज्ञान हुआ और ब्रह्मा द्वारा गुर-शिष्य परम्परा से साधारण मनुष्यों को वेद-वाणी का ज्ञान सुलभ हुआ और वे ऋषि कहलाए तथा इस कल्याणकारी वेद-वाणी के द्वारा पिछले तीन युगों [सतयुग, त्रेता, द्वापर] की जनता अति आनन्दयुक्त वातावरण में निरोग एवं सुखी जीवन व्यतीत करने में सफल हुई। परन्तु कलियुग के प्रारम्भ  से ही इस वेद-वाणी का मनुष्यों ने त्याग करके स्वयं अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली और दु:खी वातावरण में रहने लगे। उस समय यह वेद-वाणी किसी को भी कठिन नहीं लगती थी। श्रीराम, श्रीकृष्ण महाराज, ऋषि-मुनियों ने इस वाणी को कठिन नहीं समझा और इस वाणी को जीवन में अपनाया। परन्तु दु:ख है कि वेद-विरोधी तत्त्वों ने कलियुग के प्रारम्भ से ही ईश्वर से उत्पन्न इस शुद्ध, पवित्र  और सुखदायी वेद-वाणी का जनता से त्याग करवाकर और अपनी सुविधानुसार भिन्न-भिन्न भक्ति के मार्ग बनाकर और इस प्रकार अविद्याग्रस्त होकर, दु:खों को ही सुख मानकर, दु:खों के वातावरण मे जीने पर स्वयं को विवश कर लिया है। हमें सुख-शान्ति, निरोगता आदि पाने के लिए देश को सोने की चिड़िया और विश्व-गुरु कहलाने के लिए वेदों की ओर पुन: लौटना होगा।
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