वेद मन्दिर, योल (हि.प्र.) में चल रहे 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के 45वें दिन स्वामी राम स्वरूप जी



 वेद मन्दिर, योल (हि.प्र.) में चल रहे 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के 45वें दिन स्वामी राम स्वरूप जी, योगाचार्य ने जिज्ञासुओं एवं साधारण जन को उपदेश दिया कि वे अपनी ईश्वर एवं ईश्वर रचना तथा प्रकृति रचित पदार्थों अथवा अन्य किसी भी समस्या का निवारण करने हेतु चारों वेदों के ज्ञाता, इन्द्रिय संयमी, तपस्वी आदि अनेक शुभ गुणों से भरपूर विद्वानों के सानिध्य में रहकर प्रश्न करें। विद्वान प्रत्येक प्रश्न के उत्तर वेदानुसार देते हैं और भ्रम आदि को नष्ट करते हैं, अविद्या का नाश करके विद्या का प्रकाश करते हैं। उदाहरणार्थ ईश्वर ने यजुर्वेद मन्त्र 23/9 में विद्वानों से किस प्रकार प्रश्न करें, ऐसी विधि समझाई है। "कः स्वित् एकाकी चरति" अर्थात् कौन अकेला चलता है? उत्तर:- सूर्य अकेला चलता है। दूसरा प्रश्न --
"कः उ स्वित् पुनः जायते" उत्तर:- पुनः चन्द्रमा उत्पन्न होता है। अर्थात् सूर्य के प्रकाश से ही 
चन्द्रलोक प्रकाशित होता है। 
तीसरा प्रश्न:- ठण्ड की औषधि क्या है? उत्तर:- अग्नि ठण्ड की औषधि है। चौथा प्रश्न:- कौन महान् बीज बोने का क्षेत्र है? उत्तर:- महान् बीज बोने का क्षेत्र भूमि है। पाँचवाँ प्रश्न:- प्रथम स्मृति का विषय क्या है? उत्तर:- प्रथम स्मृति का विषय वर्षा है। क्योंकि वर्षा से ही अन्न आदि उत्पन्न होता है और अन्न तथा जल पाकर सब प्राणी जीवित रहते हैं, इत्यादि। 
       हमें विचार करना पड़ेगा कि पाठशाला, विश्वविद्यालय आदि में प्रतिवर्ष परीक्षा में प्रश्न का सही उत्तर पाकर ही विद्यार्थी को उत्तीर्ण किया जाता है। यह पद्धति भी वेदों से ही निकली है। यदि जिज्ञासु विद्वान् से प्रश्न नहीं करेगा तो वह अज्ञानी ही रह जाएगा और वह कहलाने वाला विद्वान्, विद्वान् नहीं है, जो विद्यार्थी के प्रश्न का उत्तर न दे सके। 
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