वेद मन्दिर, योल में 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के अवसर पर स्वामी राम स्वरूप जी

योगाचार्य ने अथर्ववेद मन्त्र 12/1/4,5 की व्याख्या करते हुए उपदेश दिया कि जिस पृथिवी की पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण; ये चार बड़ी दिशा हैं जिसमें अन्न और खेतियाँ, वृक्ष तथा फल-फूल आदि अनेक जड़ी-बूटियाँ उत्पन्न होती हैं, जहाँ स्वाँस लेते हुए
और चेष्टा करते हुए प्राणियों का पृथिवी पालन-पोषण करती है, वह हमारी मातृभूमि हमें गौ आदि दुधारू पशु, अन्न आदि से परिपूर्ण रखे।
इस हमारी मातृभूमि पर हमारे पूर्वजों ने एक से एक बढ़कर कर्तव्य-कर्म किए और सुख पाया तथा शक्तिशाली हमारे पूर्वजों/देवताओं ने असुरों को पराजित किया। ऐसी सुखदायी पृथिवी माता हमें गऊओं, अश्वों आदि सुखदायी पशुओं तथा अन्न देने वाली पृथिवी हम प्राणियों को ऐश्वर्य, तेज एवं बल आदि दे।
इसी कारण परमेश्वर ने अथर्ववेद मन्त्र 12/1/12 में हम सब नर-नारियों को उपदेश दिया है कि हे मनुष्यों! ऐसा कहो और मानो कि आप पृथिवी के पुत्र एवं पुत्रियाँ हो। क्योंकि पृथिवी हम सब प्राणियों का पालन-पोषण करती है। ध्यान रहे कि उक्त मन्त्र में ईश्वर ने यह समझाया है, "माता भूमिः पुत्रो अहम् पृथिव्याः" अर्थात् पृथिवी मेरी माता है और मैं पृथिवी की रक्षा करने वाला पुत्र हूँ।
परमेश्वर ने ऐसा नहीं कहा कि पथिवी माता के समान है। आज से एक अरब 96 करोड़, 8 लाख, 53 हज़ार 127 वर्ष पूर्व जब ईश्वर द्वारा इस पवित्र एवं सुखदायी भूमि की रचना हुई, तब उस समय सभी नर-नारियों को परमेश्वर ने ऋग्वेद मन्त्र 1/51/8 के अनुसार आर्य एवं अनार्य की संज्ञा दी। उस समय वर्तमान काल की भांति हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन आदि अनेक मत-मतान्तरों का उदय नहीं हुआ था। आर्य का अर्थ है उत्तम, सज्जन नर-नारी एवं अनार्य का अर्थ है असुर वृत्ति वाले दुष्ट नर- नारी।

Popular posts from this blog

फिरसे विधानसभा का घेराव करने क़ो तैयार हिमाचल जल शक्ति विभाग पैरा कर्मचारी

धर्मशाला में कांग्रेस को लगा जोर का झटका, एकसाथ 50 परिवार भाजपा में शामिल, सुधीर शर्मा बोले, आपका स्वागत है

भारतीय संस्कृति केवल संस्कृत भाषा में ही विद्यमान है