वेद मन्दिर, योल (हि.प्र.) में चल रहे 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के 37वें दिन स्वामी राम स्वरूप जी, योगाचार्य ने जिज्ञासुओं को ऋग्वेद मन्त्र 10/33/3 की व्याख्या करते हुए समझाया कि दुःखी मनुष्य परमेश्वर से अपनी व्यथा कहता है कि हे परमेश्वर!




मुझे मेरी मानसिक वासनाएँ भिन्न-भिन्न प्रकार से खा रही हैं। जैसे कि चूहे अन्नादि रस में लिपटे अपने पूँछ आदि अंगों को खाते रहते हैं। अतः हे परमेश्वर! मुझे मोक्ष पद देकर सुख दें। जैसे चूहे अपने अंग को स्वयं खाते हैं उसी प्रकार मनुष्य अपने पाप युक्त कर्मों को करके उसके फल भोगते हुए अत्यन्त 
दुःख पाता है। परमेश्वर ने सब वेद विरुद्ध पाप कर्मों को नष्ट करके केवल परमेश्वर की ही स्तुति, प्रार्थना तथा उपासना वेदानुसार कराकर मोक्ष पद प्राप्त कराता है। 
      स्वामी जी ने पुनः 8वें मन्त्र का भाव समझाया कि मनुष्य का मानव जन्म तभी सफल होता है जब मनुष्य वेद मार्ग पर चलकर मोक्ष सुख का तथा भौतिकवाद में गृहस्थाश्रम सुख का भी अधिकारी बन जाता है। अर्थात् वैदिक आध्यात्मिकवाद में भी उन्नति करे जिससे मोक्ष सुख प्राप्त हो तथा वेदानुसार भौतिकवाद अर्थात् गृहस्थाश्रम विज्ञान और प्रत्येक शुभ कर्मों, जो वेदों में कहे गए हैं उनपर चलकर धन, सम्पदा, परिवार का सुख भोगे। भाव यही है कि भौतिकवाद के साथ-साथ आध्यात्मिकवाद में उन्नति ही मनुष्य को परम सुख देती है, अन्यथा माता के गर्भ में भी पीड़ित, बुढ़ापे का दुःख तथा मृत्यु आदि का दुःख इत्यादि उसे चैन की सांस नहीं लेने देता। 
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