वेद मन्दिर, योल मे चल रहे 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के 35वें दिन स्वामी राम स्वरूप जी, योगाचार्य ने ऋग्वेद मन्त्र 10/27/9 पर जिज्ञासुओं का मन आकर्षित करते हुए
समझाया कि परमेश्वर ने मन्त्र में स्वयं उपदेश किया है कि वह "जनानाम् उर्वज्रे अन्तः" उत्पन्न हुओं के प्राप्ति स्थान हृदय में "अहम् सम्" मैं परमात्मा स्वयं विराजमान हूँ। उन्होंने समझाया कि मन्त्र का भाव है कि परमात्मा कण-कण में विराजमान होने पर भी केवल मानव हृदय में विराजमान है और दूसरा यह समझाया "अयुक्तं युनजत्" अर्थात् योगाभ्यास में जो चंचल मन नहीं लगता उस अस्थिर मन को योग विद्या में, उपासना में एवं वेदानुसार शुभ कर्म करने में लगाएँ।
योग शास्त्र सूत्र 1/14,15 में जो पाँच चित्त की वृत्तियाँ बाहर के प्रकृति रचित
चमकीले पदार्थों में जाती है, उनको वेद एवं योग शास्त्र में वर्णित योगाभ्यास एवं वैराग्य द्वारा रोककर ही प्रभु प्राप्ति और सब सुख प्राप्त किए जाते हैं।
योग शास्त्र में कहा कि वह प्रभु प्राप्ति करने वाला योगाभ्यास अन्तिम सांस तक किया जाता है और निरन्तर आदर सहित किया हुआ होता है एवं दृढ़ अवस्था वाला होता है। ऐसे वैदिक शुभ कर्म करने के संस्कार चित्त पर सदा बने रहते हैं और साधक को आनन्द देते रहते हैं। भगवद्गीता में भी श्रीकृष्ण महाराज ने श्लोक 6/38-42 में स्पष्ट किया है कि वैदिक शुभ कर्म एवं योगाभ्यास का फल कभी नष्ट नहीं होता और जन्म- जन्मांतरों तक चलता रहता है। ऐसे ही पुण्यवान् वैदिक कर्मों के अभ्यास से साधकों का अगला जन्म योगियों के कुल में होता है और प्रभु की प्राप्ति होती है। अतः हमारे द्वारा त्याग किए वेदों को हम पुनः जीवन में धारण करके, दुःखों का नाश करके परम पद---- मोक्ष प्राप्त करें।
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