वेद मन्दिर, योल (हि.प्र.) में चल रहे 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के 34वें दिन स्वामी राम स्वरूप जी, योगाचार्य ने ऋग्वेद मन्त्र 10/22/3 से जिज्ञासुओं को उपदेश किया



  कि जो श्रद्धालु/जिज्ञासु परमेश्वर की दृढ़ उपासना करता है तो परमात्मा भी उस उपासक का [प्रियम् पुत्रम् इव पिता] अर्थात् प्रिय पुत्र का पिता समान 
व्यवहार करता है। मन्त्र 2 में कहा है कि परमात्मा उपासक के लिए पूर्ण रूप से यश, धन एवं अन्न प्राप्त कराता है। अतः परमेश्वर हमारे पिता के समान है। पिता उसे कहते हैं जो बच्चों का पालन-पोषण करता है। परमेश्वर सब जगत् का पालन-पोषण करता है। अतः परमेश्वर सब जगत् का पिता है।
ऐसे सर्वशक्तिमान्, संसार का पालन-पोषण करने वाले परमेश्वर से उत्पन्न चारों वेदों की जो निन्दा करता है, मनुस्मृति श्लोक 2/11 में उसे "नास्तिको वेद निन्दकः" अर्थात् वेद की निन्दा करने वाले को नास्तिक कहते हैं। व्यास मुनि कृत महाभारत ग्रन्थ के वन पर्व के श्लोक 24/63 में वेद निन्दक को मूर्ख कहा है। हम अपने ऋषि-मुनियों की वाणी का आदर करें और वेद की निन्दा से बचें। स्वामी जी ने पुनः ऋग्वेद मन्त्र 10/48/7 के विषय में समझाया कि जिसमें परमेश्वर स्वयं कहते हैं, "मैं एक अकेला हूँ फिर भी एक निन्दक या नास्तिक वर्ग को अपने अधीन करके दण्ड देता हूँ"। परमेश्वर पुनः इस मन्त्र में उपदेश करते हैं कि "जैसे संग्राम में योद्धाओं का हनन किया जाता है उसी प्रकार मैं [परमेश्वर] नास्तिकों एवं निन्दकों का हनन करता हूँ"। अतः हम वेद विद्या में परमेश्वर की शक्तियों को समझकर परमेश्वर एवं वेदों की निन्दा न करें अपितु जैसा लेख में ऊपर कहा हम विद्वानों के पास जाकर 
वेदानुसार ईश्वर की उपासना करके धन, सम्पदा, परिवार एवं मोक्ष प्राप्ति द्वारा परिवार सहित सदा आनन्द में रहें। 
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