वेद मन्दिर, योल (हि.प्र.) में चल रहे 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के 32वें दिन स्वामी राम स्वरूप जी,
योगाचार्य ने अथर्ववेद मन्त्र 5/12/10 के विषय में समझाते हुए श्रद्धालुओं को कहा कि परमेश्वर ने सभी नर-नारियों को उपदेश किया कि "देवानाम् पाथे" देवताओं के मार्ग में अर्थात् देवयान मार्ग पर चलकर इस जीवन को, वेदों में उपदेश किए सद्गुणों को धारण करने के लिए, परमेश्वर की उपासना एवं परमेश्वर का स्मरण नित्य कर।
पुनः परमात्मा ने सब साधकों को सात्विक भोजन करने का उपदेश किया। स्वामी जी ने ऋग्वेद मन्त्र 10/18/1 का ज्ञान देते हुए कहा कि मारने वाला काल पुनः-पुनः मनुष्य को मृत्यु प्राप्त कराता है परन्तु जो उपासक देवयान अर्थात् मोक्ष मार्ग पर चलते हैं उन्हें परमेश्वर पूर्ण आयु से युक्त करता है। अतः जीवन का ध्येय वेद मार्ग पर चलकर मोक्ष पद प्राप्त करना है। मोक्ष अवस्था में जीव के सब दुःखों का नाश हो जाता है एवं जीव ईश्वर के सानिध्य में परमानन्द में रहता है।
देवयान जो मोक्ष का मार्ग है, उससे भिन्न अथर्ववेद मन्त्र 12/2/10 में "पितृयाणैः पथिभिः" अर्थात् पितृयान मार्ग का उपदेश है जिसमें काम, क्रोध, मद, लोभ, अहंकार, अभक्ष्य का भक्षण करना इत्यादि आता है। इस मार्ग पर कमाओ, खाओ, सन्तान उत्पन्न करो फिर मृत्यु को प्राप्त करके अगले जन्म में पुनः यही परम्परा बनाए रखो। इसमें परमेश्वर की प्राप्ति का प्रश्न ही नहीं उठता। यह तो दुःखों के सागर में डुबकी लगाने वाला मार्ग है। अतः परमेश्वर ने वेदों में उपदेश किया है कि मनुष्य का शरीर पाकर जीव देवयान मार्ग पर ही चले।
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