वेद मन्दिर, योल में चल रहे 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के 31वें दिन स्वामी राम स्वरूप जी, योगाचार्य ने श्रद्धालुओं को समझाया कि वर्तमान काल में भिन्न-भिन्न देशों के भिन्न-भिन्न इतिहास हैं



 पुनः भिन्न-भिन्न देशों के भिन्न-भिन्न संविधान हैं, संस्कृति है। यह हमें याद रखना चाहिए कि प्रलय काल समाप्त होने के पश्चात् जब परमेश्वर जड़ प्रकृति को लेकर सृष्टि रचना करता है (देखें ऋग्वेद मंडल 10 सूक्त 129), उस समय सम्पूर्ण पृथिवी का एक ही राजा होता है। अतः पृथिवी रचना, उस समय की संस्कृति, सृष्टि रचना का इतिहास एवं सम्पूर्ण सृष्टि के एक ही राजा का वेदानुसार बनाया जनता को पालने का संविधान को समझने के लिए तो हमें केवल एक ही अनन्त गुणों एवं अनन्त ज्ञान युक्त ईश्वर से उत्पन्न (देखें ऋग्वेद मन्त्र 10/181/1,2) चारों वेदों में कही विद्या का ही अध्ययन करना पड़ेगा क्योंकि वेदों के अतिरिक्त ऐसा जगत्
उत्पत्ति आदि का विकट ज्ञान ईश्वर के अतिरिक्त अन्य कोई भी जीव देने में कदापि समर्थ नहीं है।
परन्तु दुःख की बात केवल यही है कि इस युग में मनुष्यों ने वेद ज्ञाता तपस्वियों के पास जाकर आदि काल में ब्रह्मा द्वारा बनाई गुर-शिष्य परम्परा द्वारा वेदों का अध्ययन और उनसे ज्ञान प्राप्ति की परम्परा का मूलतः त्याग करके स्वयं अपने-अपने ईश्वर भक्ति के मार्ग बना लिए हैं। इस विषय में तुलसीदास जी ने अपनी रामायण उत्तरकाण्ड दोहा 100(ख) में कहा है ---
"श्रुति संमत हरि भक्ति पथ संजुत बिरति बिबेक।
तेहिं न चलहिं नर मोह बस कल्पहिं पंथ अनेक।।"
अर्थात् वेद में कहे ज्ञान तथा वैराग्य के अनुसार जो परमेश्वर की भक्ति का मार्ग है उस सच्चे मार्ग को मनुष्य ने मोह वश छोड़ दिया और वेद के विरुद्ध अनेकों नए-नए पंथों की कल्पना करते हैं। सांख्य शास्त्र के मुनि कपिल ने कहा :---
"न कल्पनाविरोधः प्रमाणदृष्टस्य"
(सांख्य शास्त्र सूत्र 2/25)
अर्थात् जो वस्तु प्रमाण द्वारा सिद्ध है उसका केवल कल्पना के आधार पर विरोध नहीं किया जा सकता। अतः वेद एवं वेद में वर्णित योग विद्या, शास्त्र, उपनिषद् , श्रीमद्भगवद्गीता, वाल्मीकि रामायण इत्यादि सद्ग्रन्थों के प्रमाण से सत्य सिद्ध है। फिर ऋषियों-मुनियों एवं स्वयं श्रीराम एवं योगेश्वर श्रीकृष्ण एवं उस समय की सब प्रजाओं ने इस विद्या को जीवन में उतारा था। अतः सृष्टि में मानव द्वारा इसका विरोध केवल कल्पना के आधार पर किसी भी प्रकार सम्भव नहीं क्योंकि जो भी वेद या योग विद्या का विरोध करेंगे वे अपनी स्वयं की कल्पना के आधार पर करेंगे। वेद, शास्त्र, उपनिषद्, गीता, वाल्मीकि रामायण, ग्रन्थ इत्यादी के आधार पर कोई भी विरोध नहीं कर पाएगा।

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