वेद मन्दिर, योल (हि.प्र.) में चल रहे 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के 28वें दिन स्वामी राम स्वरूप जी, योगाचार्य ने ऋग्वेद मन्त्र 7/67/8 के विषय में समझाया कि परमेश्वर मन्त्र में स्वयं ज्ञान देते हुए उपदेश कर रहे हैं कि सर्वशक्तिमान् परमेश्वर सब नर-नारियों का, एक समान उपासना करने योग्य, देव है।
वर्तमान काल में वेद विरुद्ध यह जो मनुष्यों ने स्वयं नियम निर्धारित किए हैं कि अमुक नर-नारी अमुक जाति का होने के कारण ईश्वर भक्ति नहीं कर सकता, यह ईश्वर को अप्रसन्न करने वाली क्रिया है। हम वेद विद्या को समझें और सब मिलजुल कर प्यार से शुभ कर्म करें एवं उस एक परमात्मा की उपासना करें जो सर्वशक्तिमान् है तथा सर्वव्यापक, सृष्टि रचयिता है। उपासना करने के विषय में उपनिषद् में श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन ये तीन वैदिक शुभ कर्म कहे गए हैं। सामवेद मन्त्र 50 में कहा "श्रुधि श्रुत्कर्ण" अर्थात् हे सुनने में समर्थ प्राणी! तू वेदों से परमात्मा का उपदेश सुन।
स्वामी जी ने अथर्ववेद मन्त्र 1/1/4 में परमेश्वर ने स्पष्ट उपदेश किया है कि हे परमेश्वर! मैं वेद सुनना कभी न छोड़ूँ। पुनः सुने हुए वेद मन्त्रों के अर्थ एवं भाव समझकर, उन पर मन द्वारा गहन विचार करने का नाम मनन है। जब मनन करने के पश्चात् उस वेद मन्त्र का ज्ञान बुद्धि में स्थिर हो जाता है तो उस ज्ञान को जीवन में अपनाने का नाम निदिध्यासन है। दुःख यही है कि जीव ज्ञान सुन भी ले तो बिरला ही कोई वैदिक ज्ञान को जीवन में धारण करता है। उदाहरणार्थ --- व्यास मुनि कृत महाभारत में वनों में युधिष्ठिर से यक्ष ने प्रश्न किया, "कः पन्थाः?" अर्थात् हम किस मार्ग पर चलकर जीवन व्यतीत करें।
पिछले युगों में सभी नर-नारियों का एक ही जीवन पथ था और वह था वेद मार्ग। वेद विद्या सबके निदिध्यासन अर्थात् आचरण में थी। फलस्वरूप युधिष्ठिर महाराज ने यक्ष को तुरन्त उत्तर दिया कि वनों के वातावरण में, जहाँ कोई भी ऋषि-मुनि अभी यहाँ नहीं है, अतः तर्क-वितर्क से जो सत्य सिद्ध होता; यहाँ तर्क-वितर्क नहीं किया जा सकता। मनुष्यों के विचार भी भिन्न-भिन्न हैं।
तीसरा, कोई ऐसा एक भी ऋषि यहाँ नहीं है जिसका मत प्रमाण माना जाए [क्योंकि मन्त्रदृष्टा ऋषि के मत को प्रमाण मानते हैं एवं अपने विचार को सत्य सिद्ध करने के लिए ?प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम; ये तीन प्रमाण माने गए हैं।
आगम प्रमाण में वेद प्रमाण एवं ऋषि प्रमाण सत्य कहा गया है, अन्य विचार सत्य नहीं हैं। देखें योग शास्त्र सूत्र 1/7]।
युधिष्ठिर ने चौथा विचार यह कहा कि धर्म का तत्त्व अत्यन्त गूढ़ है। अतः हे यक्ष! महाजनो येन गतः स पन्थाः" अर्थात् महापुरुष [ऋषि-मुनि,तपस्वियों, समाधिस्थ पुरुषों को महापुरुष कहा गया है] जिस मार्ग से जाते रहे हैं वही मार्ग श्रेष्ठतमम् है। और यह सर्वविदित है कि महापुरुष [वेदों को जाननेवाले समाधिस्थ पुरुष] अनादि काल से केवल वेद मार्ग से ही जीवन व्याप्त करके मोक्ष पद प्राप्त करते रहे हैं।
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