वेद मन्दिर, योल (हि.प्र.) में 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के अवसर पर स्वामी राम स्वरूप जी, योगाचार्य ने ऋग्वेद मन्त्र 1/164/20 की व्याख्या करते हुए श्रद्धालुओं को ईश्वर और जीवात्मा के विषय में समझाया।
उन्होंने कहा कि उक्त मन्त्र का परमेश्वर ने अलंकार युक्त भाषा में उपदेश किया है कि सुन्दर पंखों वाले, एक समान सम्बन्ध रखने वाले, मित्रों के समान दो पक्षी एक वृक्ष पर आश्रय लेते हैं। इनमें से एक पक्षी वृक्ष के पके फल को खाता है और दूसरा पक्षी फल को नहीं खाता। परन्तु यह दूसरा पक्षी सब ओर से देखता है। मन्त्र में वृक्ष को "मानव शरीर" कहा है और फल खाने वाले पक्षी को "जीवात्मा"। जैसे वृक्ष को काटा जाता है अथवा वृक्ष समय आने पर सूख जाता है, गिर जाता है। इसी प्रकार मानव शरीर भी वृद्धावस्था में कष्टों को सहता हुआ नष्ट हो जाता है। जिसे जीवात्मा रूप पक्षी कहा है वह वृक्ष के फलों को खाता है। भाव यह है कि जीवात्मा अपने किए हुए कर्मों पुण्यवान् अथवा पाप कर्म का फल क्रमशः सुख- दुःख के रूप में भोगता है। और दूसरा पक्षी परमेश्वर कहा गया है जो पाप एवं पुण्य कर्म फल नहीं भोगता। परन्तु सर्वव्यापक होने के कारण सब जीवों को सब ओर से देखता है और मनुष्य के अच्छे-बुरे किए कर्मों का फल देता है।
इसी उपदेश को योगेश्वर श्रीकृष्ण महाराज ने अलंकारिक भाषा में भगवद्गीता श्लोक 15/1 में भी कहा है। अतः नर-नारी का शरीर पाकर हम इस ब्रह्म विद्या [वेद विद्या] को जानकर सदा सुखी रह सकते हैं अन्यथा वेद विद्या से पृथक् कोई अन्य मार्ग सुख देने वाला नहीं है, ऐसा परमेश्वर यजुर्वेद मन्त्र 31/18 में उपदेश करते हैं।
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