वेद मन्दिर, योल में चल रहे चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के 27वें दिन स्वामी राम स्वरूप जी, योगाचार्य ने ऋग्वेद मन्त्र 1/22/3 का भाव समझाते हुए कहा कि "ज्ञान दिए बिना किसी को भी ज्ञान नहीं हो सकता"।
अतः एक तो ज्ञानी, ज्ञान देने वाला होना चाहिए, दूसरा जिज्ञासु होना चाहिए, जो ज्ञान लेना चाहता है। मन्त्र में यह भी भाव है कि मनुष्य को विद्वानों से निरन्तर वेद विद्या का उपदेश सुनना चाहिए। अतः जब सृष्टि रचना के आरम्भ में कोई गुरु अथवा वेद का ज्ञानी, इत्यादि महात्मा नहीं होते तब परमेश्वर स्वयं वेदों का ज्ञान अग्नि, वायु, आदित्य एवं अंगिरा; इन चार ऋषियों को देता है और योग शास्त्र सूत्र 1/26 के अनुसार ऋषियों का प्रथम गुरु परमेश्वर होता है। परमेश्वर निराकार है। अतः परमेश्वर का मुख भी नहीं है। अतः वह बोलकर ज्ञान नहीं दे सकता। परन्तु सर्वशक्तिमान्, सर्वसमर्थ होने के कारण परमेश्वर अपनी सामर्थ्य से, इन चार ऋषियों के हृदय में चारों वेदों का ज्ञान प्रकट करता है। पुनः ब्रह्मा उक्त चार ऋषियों से, अकेले ही वेदों का ज्ञान प्राप्त करके, इन चार ऋषियों का शिष्य कहलाया। तत्पश्चात् ब्रह्मा द्वारा गुरु-शिष्य परम्परा प्रारम्भ हुई, जो आज तक चली आ रही है। अतः हमें वेदों के ज्ञाता, तपस्वी से आज भी वेदों का ज्ञान प्राप्त करके एवं वेद विद्या का आचरण करके अपना जीवन सुखी करना चाहिए। इस गुरु-शिष्य परम्परा का त्याग नहीं करना चाहिए।
वर्तमान में हमने इस वैदिक गुर-शिष्य परम्परा का त्याग करके, मनमाने ढंग से भक्ति करके परमेश्वर को क्रोधित किया है (देखें ऋग्वेद मन्त्र 10/125/4)। फलस्वरूप ही आज सम्पूर्ण विश्व में युद्ध, हिंसा, चोरी, डकैती, नारी-अपमान, भुखमरी,
हवा-पानी का तुफान, भूकम्प, आदि अनेक प्रकार के दुःखों से जनता जूझ रही है। हमें सुख-शान्ति के लिए पुनः ब्रह्मा द्वारा चलाई गुरु-शिष्य परम्परा द्वारा वेद ज्ञान प्राप्त करके स्वयं और संसार को सुखी करना होगा। अन्यथा भविष्य में तो बिल्कुल दुःखों का अम्बार लगेगा जिसे हम सहन नहीं कर पाएँगे।
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