वेद मन्दिर, योल में चल रहे चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के 26वें दिन स्वामी राम स्वरूप जी, योगाचार्य ने ऋग्वेद मन्त्र
1/14/2 पर प्रकाश डालते हुए जिज्ञासुओं को समझाया कि जगत् की रचना को देखकर मनुष्य को यह कहना चाहिए कि यह रचना ईश्वर के अतिरिक्त कोई भी अन्य प्राणी नहीं रच सकता। अतः इस अनुमान प्रमाण से यह सिद्ध है कि हम इस एक ईश्वर की ही स्तुति, प्रार्थना एवं उपासना; ईश्वर से उत्पन्न वेद मन्त्रों से ही करें और मन्त्रों को जानने के लिए किसी वेद ज्ञाता, आचार्य की शरण में जाएँ। मन्त्र में स्पष्ट उपदेश है कि हे वेदज्ञ विद्वान्! जैसे तेरी बुद्धि जिस ईश्वर के गुणगान, उपासना एवं प्रार्थना करती है, हम जिज्ञासु भी उसी प्रकार एक ईश्वर की उपासना करते रहें।
स्वामी जी ने पुनः कहा कि इस मन्त्र के यह भाव सामवेद मन्त्र 744 के अनुरूप हैं। चारों वेद ईश्वर से उत्पन्न अनादि, अनन्त एवं अविनाशी हैं। अतः उक्त सामवेद मन्त्र 744 भी ईश्वर से उत्पन्न अनादि, अनन्त, अविनाशी एवं पूर्णतः सत्य है। वेद स्वतः प्रमाण में आते हैं। अब देखिए उक्त सामवेद मन्त्र में सत्य प्रार्थना है कि हे परमेश्वर! मैं आपकी स्तुति करता हूँ। इससे पूर्व मेरे आचार्य/गुरु ने आपकी स्तुति की है। मन्त्र का भी यही भाव है कि ईश्वर की पूजा वस्तुतः अनादि काल से चली आ रही गुरु-शिष्य परम्परा के अनुसार ही करनी होती है, यह ईश्वर का नियम अटल है। यदि हम ऋग्वेद मन्त्र 10/181/1 एवं 10/109/1 का गुरु परम्परा से अध्ययन करें तो यह अनादि एवं अविनाशी सत्य उभरकर आएगा कि परमेश्वर की सामर्थ्य से चारों वेद सृष्टि रचना के आरम्भ में ईश्वर से उत्पन्न होकर चार ऋषियों के हृदय में प्रकट होते हैं। अतः उन पूर्व के चारों ऋषियों का स्वयं परमेश्वर गुरु कहलाता है [देखें योग शास्त्र सूत्र 1/26]। ब्रह्मा नाम के एक मनुष्य/ऋषि ने उन चारों ऋषियों की सेवा करके अकेले ही चारों वेदों का ज्ञान प्राप्त किया। पुनः ब्रह्मा ने गुर-शिष्य परम्परा चलाकर सब समाज को यह वेदों का ज्ञान दिया। उस युग [अर्थात् सतयुग, त्रेता, द्वापर] में मनुष्यों की कोई भी पुस्तक छपी नहीं थी और न ही कोई मनुष्य विद्वान् था। अतः हम ब्रह्मा द्वारा चलाई वैदिक गुर-शिष्य परम्परा का ही आश्रय लेकर अपने जीवन को धन्य करें, सुखी रहें, परिवार के बाल-बच्चे, सदस्य सब सुखी रहें। वेद मार्ग के अतिरिक्त सुख एवं ब्रह्म प्राप्ति का अन्य कोई मार्ग परमेश्वर ने नहीं कहा है।