वेद मन्दिर, योल में चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के 24वें दिन स्वामी राम स्वरूप जी, योगाचार्य ने ऋग्वेद मन्त्र 1/26/5 से उपदेश किया है कि मनुष्य का जन्म भोग योनि एवं कर्म योनि की श्रेणी में आता है।

 इस योनि में यजुर्वेद मन्त्र 7/48 के अनुसार प्रत्येक नर-नारी अच्छा-बुरा, कोई भी कर्म करने के लिए स्वतन्त्र है परन्तु कर्मों का फल प्राप्त करने के परतन्त्र है। प्रत्येक जीव को कर्म फल तो केवल सर्वव्यापक, सृष्टि रचयिता परमेश्वर ही देता है। पुण्यवान् कर्मों का फल सुखदायी है और पाप कर्मों का फल अति दुःखदायी है। अतः हम पाप कर्मों से बचें और पुण्यवान् कर्मों के लिए वेदाध्ययन करके, उन कर्मों को जानें। वेदों के अतिरिक्त शुभ-पुण्यवान् कर्मों का वर्णन विस्तार, गूढ़ता एवं रहस्यपूर्ण विधि से अन्य कहीं उपलब्ध नहीं है क्योंकि वेद विद्या ईश्वर से उत्पन्न अनादि एवं अविनाशी विद्या है। मनुष्य तो इस विद्या के उत्पन्न होने के पश्चात् ही ऋषियों द्वारा इस विद्या से शिक्षा ले-लेकर विद्वान् बनते हैं।
यह सुन्दर पृथिवी हम सब मनुष्यों के कर्म करने का विशाल क्षेत्र है। ऐसा ऋग्वेद मन्त्र 10/135/1 में ईश्वर का उपदेश है। तथा सर्वशक्तिमान् परमेश्वर जो हमें पालने वाला पिता-परमेश्वर है, वह कर्मों के अनुसार हमें फल देता है। यह ज्ञान हमें समझना चाहिए और हमें वेद मार्ग पर चलकर अपना जीवन सुधारना चाहिए। पुनः मन्त्र में कहा कि साधारण जन पाप वृत्ति वाली वासना से पाप कर्मों को करने लगता है और अगले जन्मों में पशु-पक्षी आदि योनियों में जन्म लेकर दुःख भोगता है। मन्त्र 4 में परमेश्वर ने समझाया कि जो जिज्ञासु मनुष्य शरीर पाकर वेदों के ज्ञाता, विद्वानों से ज्ञान प्राप्त करता है, वेद मार्ग पर चलकर वेदानुसार पुण्यवान् कर्म करके जीवन निर्वाह करता है, वह जिज्ञासु आध्यात्मिक सुख प्राप्त करने के लिए वेद मार्ग पर चलता हुआ, इस तरह संसार सागर को पार करता है जैसे किसी पानी के जहाज़ में रथ को रखकर [भाव है कि शरीर को रखकर] नदी को पार किया जाता है।
भाव है कि जैसे पानी के जहाज़ में रथ को रखा और नदी पार कर ली, रथ ने तो नदी पार करने के लिए कोई कष्ट नहीं उठाया। इसी प्रकार जब कोई जिज्ञासु वेद के ज्ञाता, विद्वान् से वेद ज्ञान प्राप्त करने के लिए जाता है तो वह जिज्ञासु भी सरलता से संसार रूपी सागर को पार करके मोक्ष पद प्राप्त करता है।

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