वेद मन्दिर, योल (हि.प्र.) में 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के अवसर पर स्वामी राम स्वरूप जी, योगाचार्य ने ऋग्वेद मन्त्र 10/181/1 से समझाया कि ईश्वर की सामर्थ्य से सृष्टि रचना के आरम्भ में चार वेद अग्नि, वायु, आदित्य एवं अंगिरा ऋषि के हृदय में प्रकट हुए

 

 ब्रह्मा ने चारों ऋषियों की सेवा करके अकेले ही चारों वेदों का ज्ञान प्राप्त किया। ब्रह्मा चारों ऋषियों का शिष्य बना और इस सृष्टि में ब्रह्मा के द्वारा गुरु-शिष्य परम्परा प्रारम्भ हुई, जो आज तक चली आ रही है एवं जिज्ञासु वेद का ज्ञान इस परम्परा द्वारा ग्रहण कर रहे हैं। यह याद रहे कि ज्ञान तब होता है जब कोई ज्ञान दे। जैसे श्रीकृष्ण ने ज्ञान अर्जुन को दिया इत्यादि। अतः हम समझें कि सर्वप्रथम ईश्वर ने चार ऋषियों को वेद का ज्ञान दिया, तब ऋषियों को ज्ञान हुआ। पुनः चार ऋषियों ने ब्रह्मा को यह ज्ञान दिया एवं ब्रह्मा ने गुर-शिष्य परम्परा से यह वेद का ज्ञान संसार में फैलाया। स्वामी जी ने ऋग्वेद मन्त्र 1/10/1 का उदाहरण देते हुए समझाया कि परमेश्वर द्वारा दिया यह वैदिक ज्ञान प्राप्त करके भिन्न-भिन्न पुरुषों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से वेदों द्वारा ही इस एक परमेश्वर की पूजा की। मन्त्र में ज्ञान है कि जिन साधकों को छन्द, राग आदि का ज्ञान हुआ, वे सामवेद से परमेश्वर का गुणगान करते हैं और जो साधक वेद मन्त्रों को उच्चारण करने के अभ्यासी हैं, वे वेद मन्त्रों से परमेश्वर की पूजा करते हैं एवं यज्ञ को करने वाले, चारों वेदों के ज्ञाता, ब्रह्मा अपने वंश को गुणयुक्त करके पुरुषार्थी बनाते हैं। सारांश है कि ईश्वर की पूजा वेदानुसार ही होती है, ईश्वर को वेदों में अद्वितीय कहा है अर्थात् ईश्वर के समान कोई
दूसरा ईश्वर नहीं है। अतः हम सब वेदों में कहे परमेश्वर का ही गान करें और पूजा करें।

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