ईश्वर को जानो
78 दिवसीय चल रहे चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के अवसर पर श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए स्वामी जी ने समझाया कि जिस परमेश्वर की हम पूजा करना चाहते हैं उस परमेश्वर के विषय में प्रथम यह जानना परमावश्यक है कि परमेश्वर किसे कहते हैं और उसकी उपासना किस प्रकार की जाती है। यह सब दुर्लभ, अद्भुत एवं असीम ज्ञान हम केवल सृष्टि रचना के आरम्भ में ईश्वर की सामर्थ्य से ईश्वर से उत्पन्न चारों वेद जो चार ऋषियों के हृदय में प्रकट होते हैं उन्हें जानना आवश्यक है। वेदों की उत्पत्ति का वर्णन ऋग्वेद मंत्र 10/181/1 में तथा 10/109/1 में विस्तार से ईश्वर ने ही समझाया है। किसी विद्वान् से इनका वर्णन सुनना परमावश्यक है।
अत: हम ईश्वर के विषय में यहाँ तनिक सा ज्ञान वेदों से दे रहे हैं कि ईश्वर किसे कहते हैं? ऋग्वेद मंत्र 10/129/2 में ईश्वर ने उपदेश किया है कि जब प्रलय में सब संसार प्रकृति के रूप में आ जाता है अर्थात् अदर्शनीय हो जाता है, यह जन्म-मृत्यु, दिन-रात और संसार का कोई भी पदार्थ नहीं होता तब उस प्रलय में भी "स्वधया आनीत्" अर्थात् स्वयं की धारण शक्ति से, स्वयं सत्ता रूप स्वयंभू एक जीता-जागता ब्रह्म तत्त्व ही था। परमेश्वर से भिन्न कुछ भी उससे अतिरिक्त नहीं था। अत: जो प्रलय में भी विद्यमान रहता है उसे ही सर्वशक्तिमान् परमेश्वर कहते हैं और यजुर्वेद मंत्र 40/8 के अनुसार परमेश्वर कायारहित होता है अर्थात् निराकार होता है। इस कायारहित सर्वशक्तिमान् परमेश्वर ने ही ऋग्वेद मंत्र 10/129/3 के अनुसार अव्यक्त प्रकृति से समस्त संसार की, सभी जीवों के शरीर की रचना की। इन अलौकिक गुणों को धारण करने वाले को ही परमेश्वर कहते हैं।
ऋग्वेद मंत्र 1/164/39 में भी अद्भुत अलौकिक ज्ञान इस विषय में दिया है कि यह समस्त जगत् पृथ्वी, सूर्य लोकादि सर्वव्यापक परमेश्वर में ही स्थित हैं। मंत्र में उपदेश है कि जो मनुष्य उस परब्रह्म अजर, अविनाशी, सर्वशक्तिमान्, निराकार परमेश्वर को वेदाध्ययन द्वारा नहीं जानता, विद्वानों की शरण में जाकर वेद नहीं सुनता अथवा जो वेदों को सुनकर भी उपर्युक्त परमेश्वर को नहीं जानता "ऋचा किम् करिष्यति" अर्थात् तब वेद उसका क्या भला करेंगे अर्थात् कुछ भला नहीं करेंगे, वह चाहे जितनी मर्जी पुस्तकें पढ़ ले या जितना चाहे वेदों को पढ़ ले परंतु उसका जीवन धूमिल ही रहेगा। यहाँ कुछ ही मंत्रों से ईश्वर के रूप को समझाने का प्रयास किया है, वस्तुत: ईश्वर के गुण अनंत हैं। हम पुन: पिछले तीन युगों की भांति विद्वानों से वेद सुनकर विद्वान् बनें, ईश्वर को जानें तत्पश्चात् ही वेदानुसार ईश्वर की उपासना करके सब सुखों का भोग करें और ईश्वर को प्राप्त करें। ईश्वर वेद से उत्पन्न हुआ है, ऐसा अथर्ववेद मंत्र 13/4/38 में उपदेश है। भाव है कि जब हम वेद मंत्रों से ईश्वर की उपासना यज्ञ द्वारा करेंगे तो ईश्वर आपके हृदय में उत्पन्न होगा।